पितृ पक्ष में गया क्यों आते हैं विदेशी? जानिए पिंडदान का रहस्य व महत्व | Khabar For You
- APOORVA RATHORE
- 08 Oct, 2026
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हर साल शरद ऋतु के आगमन और भाद्रपद पूर्णिमा के साथ ही बिहार का प्राचीन तीर्थ शहर गया एक अलौकिक और गहरे आध्यात्मिक वातावरण में डूब जाता है। पवित्र फल्गु नदी के विशाल तटों और सीढ़ियों पर कपूर की सुगंध, गीली रेत की सोंधी महक और सदियों से इस परंपरा को संजोए ‘गयावाल पंडा’ समाज के मुख से उच्चारित होते वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई देती है।
लेकिन यहां उमड़े लाखों श्रद्धालुओं के बीच हर साल एक बेहद विस्मयकारी और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिलता है - धोती-कुर्ते और उत्तरीय में सजे ऐसे अनगिनत लोग, जिनके हाथों में विदेशी पासपोर्ट होते हैं।
जर्मनी, रूस, यूक्रेन, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड, लातविया और घाना जैसे देशों से आए पुरुष और महिलाएं फल्गु नदी के तट पर भारतीय श्रद्धालुओं के साथ घुटनों के बल बैठते हैं। वे कुशा घास की अंगूठी पहनते हैं, जौ और चावल के आटे से बने पिंड हाथों में लेते हैं, काले तिल और गंगाजल से तर्पण करते हैं और हाथ जोड़कर शीश नवाते हैं। यहां आकर भू-राजनीतिक तनाव, भाषा की दीवारें और अलग-अलग मजहब पीछे छूट जाते हैं। शेष रह जाता है केवल एक शाश्वत मानवीय कर्तव्य: अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, पीढ़ियों के अनसुलझे आघातों को शांत करना और दिवंगत आत्माओं की मुक्ति (मोक्ष) की कामना करना।
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1. पितृ पक्ष का महत्व: अपनी जड़ों और कुल-परंपरा से दोबारा जुड़ना
पितृ पक्ष, जिसे 'सोलह श्राद्ध' भी कहा जाता है, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का एक अत्यंत पवित्र कालखंड है।
तीन ऋणों का सनातन दर्शन
वैदिक दर्शन के अनुसार, मनुष्य का यह जीवन केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या भौतिक उपलब्धियों की एक अकेली यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक अटूट वैश्विक और ब्रह्मांडीय शृंखला की कड़ी है। सनातन परंपरा मानती है कि प्रत्येक मनुष्य जन्म के साथ ही तीन मूलभूत आत्मिक ऋण लेकर आता है:
देव ऋण: प्रकृति और दिव्य शक्तियों का ऋण - जैसे सूर्य, जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी - जो हमारे जैविक जीवन का निरंतर पोषण करते हैं।
ऋषि ऋण: उन महान ऋषियों, विचारकों, दार्शनिकों और ज्ञान-प्रदाताओं का ऋण, जिन्होंने ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और जीवन मूल्यों को संजोकर हम तक पहुंचाया।
पितृ ऋण: अपने माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों की संपूर्ण वंशावली का ऋण, जिनके त्याग, संघर्ष, परिश्रम और आनुवंशिक (जेनेटिक) विरासत के फलस्वरूप आज हमारा अस्तित्व संभव हो पाया है।
पितृ पक्ष का यह पावन पखवाड़ा मुख्य रूप से इसी 'पितृ ऋण' को श्रद्धा और कृतज्ञतापूर्वक चुकाने के लिए समर्पित है।
लोकों का सेतु: पितृ लोक और भूलोक का मिलन
गरुड़ पुराण, वायु पुराण और अग्नि पुराण जैसे ग्रंथों में मरणोपरांत आत्मा की यात्रा का सूक्ष्म विवेचन मिलता है। इसके अनुसार, देह त्यागने के बाद आत्मा तत्काल अंतिम मोक्ष या नया जन्म नहीं लेती; वह कुछ समय के लिए स्वर्ग और पृथ्वी के बीच स्थित 'पितृ लोक' में निवास करती है। यहां आत्माएं अपने सूक्ष्म संस्कारों और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ी रहती हैं।
मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, तब पृथ्वी और पितृ लोक के बीच का सूक्ष्म पर्दा अत्यंत क्षीण हो जाता है। इस अवधि में पूर्वजों की आत्माओं को अपने वंशजों के निकट आने और उनसे भाव व जल ग्रहण करने की अनुमति मिलती है।
शास्त्रों का मत है कि यदि वंशज इस समय अपने पूर्वजों की उपेक्षा करते हैं, तो आत्माएं व्यथित होकर लौटती हैं, जिससे परिवार में 'पितृ दोष' उत्पन्न होता है - जो अशांति, स्वास्थ्य बाधाओं या आर्थिक संकट के रूप में परिलक्षित हो सकता है। इसके विपरीत, जब वंशज पूरे मन से उनका स्मरण और तर्पण करते हैं, तो पूर्वजों की आत्मा तृप्त होकर अपने कुल को शांति, आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती है।
आधुनिक जीवन की विसंगति का समाधान
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, एकल परिवारों के बढ़ते चलन और डिजिटल दुनिया के शोर ने हमें अपनी जड़ों और पूर्वजों से पूरी तरह काट दिया है। आज अधिकांश लोगों को अपने परदादा या परदादी का नाम तक याद नहीं रहता।
पितृ पक्ष इस आधुनिक विस्मृति की एक सशक्त काट है। यह हमें वर्ष में एक बार ठहरकर अपनी पारिवारिक विरासत पर विचार करने, अपने भीतर मौजूद उनके संस्कारों को पहचानने और उनके प्रति नतमस्तक होने का अवसर देता है। यह किसी अपने को खोने के अनकहे दुख को एक शांत, आध्यात्मिक और कृतज्ञता से भरे अनुष्ठान में बदल देता है।
2. गया धाम: विश्व का मोक्ष केंद्र और सीमाओं से परे का आकर्षण
यूं तो काशी, हरिद्वार, प्रयागराज और नासिक जैसे अनेक पावन तटों पर पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, परंतु पितृ तर्पण के लिए 'गया' का स्थान सर्वोपरि माना गया है।
गया क्षेत्र की पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता
गया की महिमा का संबंध 'गयासुर' नामक परम तपस्वी और धर्मात्मा असुर से जुड़ा है। गयासुर की कठोर तपस्या और पवित्रता से जब समस्त संसार विस्मित हो गया, तब भगवान विष्णु ने जगत के कल्याण के लिए अपने चरण उसके मस्तक पर रखे। गयासुर ने पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु के चरणों को स्वीकार किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि यह भूमि सदैव के लिए मोक्ष की स्थली बनेगी। यहां जो भी व्यक्ति अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान करेगा, उसकी पीढ़ियों को कष्टों से मुक्ति मिलेगी और सीधे मोक्ष (वैकुंठ) की प्राप्ति होगी।
गया तीर्थ में पिंडदान के तीन प्रमुख केंद्र सबसे महत्वपूर्ण हैं:
1.फल्गु नदी: वह अंतःसलिला नदी, जिसकी ऊपरी सतह पर केवल रेत दिखाई देती है और जल नीचे प्रवाहित होता है। मान्यता है कि यहीं माता सीता ने राजा दशरथ के लिए बालू का पिंड बनाकर तर्पण किया था, जिसने यह सिद्ध किया कि श्राद्ध में बाह्य साधनों से अधिक अंतर्मन की पवित्र भावना का महत्व है।
2. विष्णुपद मंदिर: काले बेसाल्ट पत्थर पर उकेरे गए भगवान विष्णु के चरण-चिह्न (चरण-पद्म), जहां साक्षात प्रभु के चरणों पर पिंड अर्पित किए जाते हैं।
3.अक्षय वट: वह अमर वटवृक्ष जिसके नीचे भगवान राम, माता सीता, युधिष्ठिर और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पूर्वजों के लिए तर्पण किए जाने की कथाएं हैं। यह वृक्ष काल और भौतिक क्षय से परे अमरता का प्रतीक है।
वैश्विक श्रद्धालुओं का आगमन: युद्ध के मैदानों से लेकर पश्चिमी राजधानियों तक
पिछले कुछ वर्षों में पितृ पक्ष के दौरान गया में एक बहुत बड़ा वैश्विक बदलाव देखने को मिला है। स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ अब दुनिया भर से साधक यहां खिंचे चले आ रहे हैं:
रूस और यूक्रेन: भू-राजनीतिक संघर्ष और युद्ध का दंश झेल रहे दोनों देशों के नागरिक गया के घाटों पर एक साथ, कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं। यहां युद्ध की कड़वाहट खत्म हो जाती है; आंखों में केवल अपने दिवंगत पिताओं, युद्ध में खोए भाइयों और परिजनों की शांति की प्रार्थना होती है।
जर्मनी, नीदरलैंड और लातविया: पश्चिमी जगत के वे लोग जो मनोविज्ञान की 'फैमिली कॉन्स्टिलेशन थेरेपी' (पारिवारिक आघातों का उपचार) से जुड़े हैं, वे वैदिक पिंडदान में गहरी समानता पाते हैं। कई लोग बीसवीं सदी के विश्व युद्धों के दौरान अपने परिवारों में दबे अनकहे दर्द और अपराधबोध को शांत करने के लिए यहां आते हैं।
इटली, स्पेन और पुर्तगाल: अपनी पारंपरिक मान्यताओं (जैसे 'ऑल सोल्स डे') से जुड़े लोग यहां आकर प्रत्यक्ष, पंचतत्वों पर आधारित इस विधि को अनुभव करते हैं। विशेष रूप से वे लोग जिनके परिजन अचानक दुर्घटना या असमय मृत्यु का शिकार हुए, वे यहां आकर गहरा आत्मिक संबल महसूस करते हैं।
घाना और पश्चिमी अफ्रीका: अफ्रीकी संस्कृति में पूर्वज पूजा (एंसेस्टर वर्शिप) की बहुत गहरी जड़ें हैं। घाना के साधक मानते हैं कि गया का यह वैदिक अनुष्ठान उनके पारंपरिक विश्वास से मेल खाता है, जहां पूर्वजों को विस्मृत न करके निरंतर सम्मान दिया जाता है।
मत-पंथ से परे एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव
आखिर जिनका सनातन धर्म से कोई पूर्व परिचय नहीं रहा, वे हजारों किलोमीटर का सफर तय करके यहां क्यों आते हैं?
विदेशी साधकों में से कई का कहना है कि उन्हें अपने पूर्वजों के सपने आते थे, या वे अपने जीवन में एक अनजानी भावनात्मक रिक्तता और अशांति महसूस करते थे। आधुनिक मनोविज्ञान भी अब यह स्वीकार करता है कि पूर्वजों के आघात और अनसुलझे तनाव अगली पीढ़ियों के अवचेतन में बने रहते हैं।
गया का पिंडदान अनुष्ठान उन्हें इस भावनात्मक बोझ को बाहर निकालने का एक पवित्र और ठोस माध्यम देता है। जब वे जमीन पर बैठकर अपने हाथों से जौ और चावल को गूंथते हैं, अपने पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करते हैं और प्रार्थना करते हैं, तो उन्हें एक गहरा मानसिक सुकून और आंतरिक मुक्ति का अनुभव होता है।
3. प्रमुख कर्मकांड: श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का रहस्य
पितृ पक्ष का अनुष्ठान केवल बाह्य क्रिया नहीं है, बल्कि यह भौतिक पदार्थों, वैदिक ध्वनियों (मंत्रों) और दृढ़ संकल्प का एक सूक्ष्म विज्ञान है।
श्राद्ध: अटूट निष्ठा और समर्पण
'श्राद्ध' शब्द की उत्पत्ति 'श्रद्धा' से हुई है - अर्थात 'श्रत्' (सत्य या अटूट विश्वास) और 'धा' (धारण करना)। श्राद्ध कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति निष्ठा और कृतज्ञता का पूर्ण समर्पण है।
यह अनुष्ठान उस विशेष 'तिथि' पर किया जाता है, जिस तिथि पर पूर्वज ने इस संसार को अलविदा कहा था। अनुष्ठान करने वाला व्यक्ति मन, वचन और कर्म की शुद्धि रखते हुए सात्विक वस्त्र धारण करता है और अपनी तीन पीढ़ियों का ध्यान करता है:
- पितृ (पिता) और मातृ (माता)
- पितामह (दादा) और पितामही (दादी)
- प्रपितामह (परदादा) और प्रपितामही (परदादी)
उनका गोत्र, नाम और उनके उपकारों को याद करके व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि उसका अस्तित्व इन्हीं पूर्वजों की देन है।
तर्पण: आत्मिक प्यास को शांत करना
'तर्पण' शब्द 'तृप्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'तृप्त करना या संतुष्ट करना'। इसमें शुद्ध जल, कच्चा गाय का दूध, जौ और सुगंधित पदार्थों के मिश्रण से अर्घ्य दिया जाता है।
काले तिल: काले तिल को ऊर्जा का संवाहक माना गया है। सूक्ष्म स्तर पर काले तिल में नकारात्मक ऊर्जा को सोखने और सात्विक तरंगों को आकर्षित करने का गुण होता है, जिससे अशांत आत्माएं शांत होती हैं।
कुशा घास: अनुष्ठानकर्ता अपनी उंगली में कुशा की अंगूठी (पवित्री) पहनता है। कुशा को एक आध्यात्मिक विद्युत-अवरोधक (इंसुलेटर) माना जाता है, जो अनुष्ठान के दौरान उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा को शरीर में स्थिर रखता है।
पितृ तीर्थ (दाएं अंगूठे का भाग): देवताओं को जल उंगलियों के पोरों से अर्पित किया जाता है, परंतु पूर्वजों के लिए जल अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच से प्रवाहित किया जाता है। योग विज्ञान के अनुसार हाथ का यह भाग अवचेतन और पितृ ऊर्जा से जुड़ा हुआ है।
पिंडदान: सूक्ष्म शरीर को तुष्टि प्रदान करना
गया तीर्थ का सबसे मुख्य अनुष्ठान 'पिंडदान' है।
सामग्री: उबले हुए चावल, जौ का आटा, काले तिल, गाय का घी, शहद और पवित्र जल को मिलाकर गोल पिंड (गोले) बनाए जाते हैं।
प्रतीक: यह पिंड आत्मा के 'लिंग शरीर' (सूक्ष्म शरीर) का प्रतीक माना जाता है। यह आत्मा को तृप्ति और ऊर्जा प्रदान करता है, ताकि वह अपने सांसारिक मोह को छोड़कर आगे की दिव्य यात्रा पर बढ़ सके।
समर्पण: केले के पत्तों पर या भगवान विष्णु के चरण-चिह्नों पर इन पिंडों को अर्पित करते हुए प्रार्थना की जाती है कि दिवंगत आत्मा सभी सांसारिक बंधनों, तृष्णाओं और कष्टों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करे।
4. पंचबलि: सृष्टि के कण-कण से एकात्मता का भाव
पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म का एक अत्यंत मानवीय और दार्शनिक पहलू है 'पंचबलि'। इसका अर्थ है परिवार के भोजन करने से पूर्व समाज और प्रकृति के पांच अलग-अलग अंगों को भोजन समर्पित करना। यह विधान इस बात का स्मरण कराता है कि मनुष्य अकेला नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण जीव-जगत से जुड़ा हुआ है।
गो-बलि (गाय को ग्रास)
पहला भाग अत्यंत आदर के साथ देशी गाय को दिया जाता है। भारतीय संस्कृति में गाय को 'गौ माता' और पृथ्वी का सजीव रूप माना गया है। गाय को भोजन कराना उस प्रकृति और धरती के प्रति कृतज्ञता है जो समस्त जीवों को अन्न और पोषण देती है।
श्वान-बलि (श्वान यानी कुत्ते को भोजन)
दूसरा भाग कुत्ते को दिया जाता है। वैदिक परंपरा में श्वान को धर्मराज (यमराज) का अनुचर और भैरव का वाहन माना गया है। वे मृत्यु और जीवन की चौखट के सजग प्रहरी हैं। बेसहारा श्वान को भोजन देकर मार्ग के सभी अवरोधों को शांत करने की प्रार्थना की जाती है।
काक-बलि (कौवे को आहार)
तीसरा और सबसे प्रसिद्ध ग्रास कौवे के लिए छत या खुले स्थान पर रखा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं में कौवे को पितरों का संदेशवाहक और शनि देव का वाहन माना गया है। ऐसी लोक मान्यता है कि पितर कौवे के माध्यम से अपने परिजनों द्वारा दिया गया अन्न स्वीकार करते हैं। जब कौवा आकर उस भोजन को ग्रहण करता है, तो परिवार को यह आत्मिक संतोष होता है कि उनके पूर्वजों तक उनका भाव पहुंच गया है।
देवादि-बलि (प्रकृति और देव शक्तियों को आहुति)
चौथा भाग अग्नि में समर्पित किया जाता है या बहते जल में प्रवाहित किया जाता है। यह समस्त प्राकृतिक शक्तियों - अग्नि, जल, वायु, आकाश - और कुल के रक्षक देवताओं के प्रति आभार है, जिन्होंने पीढ़ियों से परिवार की रक्षा की है।
पिपीलिका-बलि (चींटियों और सूक्ष्म जीवों को अन्न)
अंतिम भाग के रूप में पिसा हुआ आटा और शक्कर चींटियों और भूमिगत छोटे-छोटे जीवों (पिपीलिका) के लिए डाला जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि सनातन धर्म में विशालकाय हाथी से लेकर पैरों तले रेंगने वाली नन्हीं चींटी तक, हर जीव के जीवन का सम्मान और उत्तरदायित्व मनुष्य पर है।
5. अन्नदान और सेवा: कर्मों की शुद्धि का माध्यम
दान के बिना कोई भी श्राद्ध अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। शास्त्रों का निर्देश है कि पितृ पक्ष में संग्रह करने के बजाय त्याग और उदारता को अपनाना चाहिए, क्योंकि निस्वार्थ भाव से किया गया दान ही पुराने कर्म बंधनों को काटता है।
अन्नदान: सबसे बड़ा पुण्य
कहा गया है कि संसार में भूखे को अन्न देने से बड़ा कोई पुण्य नहीं है। पितृ पक्ष के दौरान लोग भंडारे आयोजित करते हैं, असहायों को भोजन कराते हैं और घाटों पर आए साधु-संतों की सेवा करते हैं। जब कोई भूखा व्यक्ति तृप्त होकर जल पीता है, तो उसके भीतर से निकलने वाला मौन आशीष सीधे दानदाता के पितरों तक पहुंचता है और उन्हें तृप्ति देता है।
वस्त्र और जीवनोपयोगी वस्तुओं का दान
अन्न के साथ-साथ इस पखवाड़े में जरूरतमंदों को व्यावहारिक और सुरक्षात्मक वस्तुएं दी जाती हैं:
जूते-चप्पल: राहगीरों और निर्धनों के पैरों की रक्षा के लिए, जो जीवन की कठिन राहों के आसान होने का प्रतीक है।
छाता: धूप और बारिश से बचाव के लिए, जो कष्टों से रक्षा का प्रतीक है।
वस्त्र और कंबल: आगामी शीत ऋतु से निर्धनों की सुरक्षा के लिए।
जलपात्र: राहगीरों के पीने के पानी के लिए तांबे या पीतल के बर्तनों का वितरण।
इन कार्यों से पूर्वजों की स्मृति केवल पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के काम आती है।
6. सर्वपितृ अमावस्या: छूटे हुओं को याद करने का अंतिम पर्व
सोलह दिनों के इस पावन काल का समापन 'सर्वपितृ अमावस्या' (महालया अमावस्या) के दिन होता है।
भूले-बिसरे पितरों के लिए सर्वसमावेशी दिन
कई बार पीढ़ियां बीत जाने पर हमें अपने पूर्वजों की ठीक-ठीक मृत्यु तिथि याद नहीं रहती। कुछ पूर्वज ऐसे भी हो सकते हैं जो युद्ध में मारे गए हों, महामारी या दुर्घटना का शिकार हुए हों, या किसी सुदूर देश में गुमनामी में देह त्याग चुके हों।
सर्वपितृ अमावस्या एक ऐसा उदार और सर्वसमावेशी दिन है जो किसी को पीछे नहीं छोड़ता:
- इस दिन किया गया तर्पण उन सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों तक स्वतः पहुंच जाता है, जिनकी तिथि हमें ज्ञात नहीं है।
- यह उन आत्माओं के लिए भी किया जाता है जिनका कोई वंशज इस संसार में जीवित नहीं बचा।
- यहां तक कि इस दिन पूरे ब्रह्मांड की उन सभी आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है, जिनके निमित्त कोई जल देने वाला नहीं है।
दीपदान: प्रकाश का मार्ग
सर्वपितृ अमावस्या की संध्या को गया के फल्गु तट और अन्य सरोवरों का दृश्य बेहद भावुक कर देने वाला होता है। श्रद्धालु पत्तों के दोने में सरसों के तेल के दीपक जलाकर नदी की जलधारा में प्रवाहित करते हैं।
जल पर तैरते हजारों सुनहरे दीयों का यह 'दीपदान' इस विश्वास का प्रतीक है कि हम अपने पूर्वजों की विदाई के मार्ग को आलोकित कर रहे हैं। इन दीपों के उजाले में पूर्वज अपने वंशजों को सुख, शांति और सुरक्षा का आशीष देकर पुनः अपने दिव्य धाम की ओर प्रस्थान करते हैं।
मानवता के नाम एक शाश्वत संदेश
गया के पावन तटों पर हर साल जुटने वाला यह अंतरराष्ट्रीय जनसैलाब एक बहुत गहरी बात सिखाता है।
अलग-अलग भाषाएं, त्वचा के रंग, राष्ट्रीयताएं और धार्मिक मान्यताओं के बावजूद, संसार के हर इंसान के भीतर अपने पूर्वजों को नमन करने, अपने मूल को तलाशने और मृत्यु के रहस्य को समझने की एक समान तड़प है। जब यूक्रेन और रूस का साधक, या घाना और जर्मनी का नागरिक, भारत के किसी आम ग्रामीण के पास बैठकर पूर्वजों को जल अर्पित करता है, तो यह सिद्ध हो जाता है कि:
शोक की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती, प्रेम की कोई सरहद नहीं होती, और अपने पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करने की भावना पूरी मानव जाति को एक सूत्र में पिरोती है।
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